वैज्ञानिक विश्वसनीयता: उच्च
आपके सामने एक विशाल, लगभग समतल दिखती ज्वालामुखीय ढाल धीरे-धीरे दूरस्थ गर्त की ओर उतरती है, जहाँ गहरे धूसर से कोयला-रंग के बेसाल्टिक लावा-प्रवाह महीन तरंगों जैसी रेखीय उभारों और चादरनुमा परतों में फैले हैं। इस भूभाग की बनावट उफनकर बहने वाले, कम श्यानता वाले लावा से बने शील्ड ज्वालामुखियों की पहचान है; कहीं सतह अपेक्षाकृत चिकनी है, तो कहीं ठंडा होकर फटी पपड़ी, लौह-ऑक्साइड के लाल-भूरे दाग, और पुराने तनाव-विदरन इसकी लंबी भूवैज्ञानिक कहानी बताते हैं। ऊपर आकाश नहीं, बल्कि अतितप्त कार्बन डाइऑक्साइड और सल्फ्यूरिक अम्लीय एरोसोल से भरी पीली-धूसर धुंध की एक अपारदर्शी छत है, जो प्रकाश को इतना बिखेर देती है कि कोई तीखी छाया बनती ही नहीं और कुछ किलोमीटर बाद पूरा दृश्य धुंध में घुल जाता है। इस मंद, दमघोंटू, छायारहित उजाले में पैमाना विचित्र रूप से बदल जाता है—दूर की हल्की उठानें भी पर्वताकार लगती हैं, और आप मानो किसी जीवित, धीमे-धीमे साँस लेती अग्निजन्य दुनिया की सतह पर खड़े हों।
आपके सामने फैला दृश्य एक विराट कोरोना संरचना का है, जहाँ सैकड़ों किलोमीटर तक पसरा उठा हुआ केंद्रीय गुंबद गहरे धूसर-बैंगनी बेसाल्ट की प्राचीन लावा-चादरों से बना दिखता है, और उसे घेरे हुए संकेंद्रित दरारों के वलय सतह पर किसी विशाल ज्यामितीय घाव की तरह उभरे हैं। इन वलयों के बीच बाहरी क्षेत्र हल्के धँसे हुए हैं, जबकि उनसे बाहर की ओर फैलती रेडियल दरारें बताती हैं कि नीचे से उठे गर्म पदार्थ ने कभी भूपर्पटी को ऊपर धकेला, फिर ठंडा पड़ने और धँसने पर उसे तोड़ डाला—कोरोना भू-आकृतियों के निर्माण का यही प्रमुख संकेत माना जाता है। चट्टानों पर सल्फेट और लौह-ऑक्साइड की महीन परतें गहरे जमे बेसाल्ट पर पीत-लाल आभा छोड़ती हैं, और घने, अत्यधिक दाब वाले वायुमंडल से छनकर आती पीली-धूसर रोशनी, लगभग पृथ्वी के उजले बादलों भरे दिन जैसी चमक के बावजूद, इस पूरे प्रदेश को छायाहीन, दमघोंटू सांध्य-ज्योति में डुबो देती है। क्षितिज तक फीका पड़ता यह टूटा-फूटा मैदान, गर्मी की लहरों से काँपती दूरस्थ दरारों और ऊपर पूरी तरह रिक्त आकाश के साथ, आपको ऐसे संसार के बीच खड़ा कर देता है जहाँ भूविज्ञान अभी भी किसी मौन महाविनाश की स्मृति सँजोए हुए है।
आपके सामने फैला यह विशाल, लगभग तीस किलोमीटर चौड़ा चपटा लावा-गुंबद किसी जमे हुए ज्वालामुखीय समुद्र की तरह दिखता है—उसकी फीकी धूसर, लगभग सीधी किनारी दीवारें ऊपर उठती हैं, जबकि शिखर पर केंद्र से बाहर की ओर जाती दरारें और वलयाकार टूटनें ठंडे पड़ते, धँसते लावे के इतिहास को दर्ज करती हैं। गुंबद के बीच का गहरा, टूटा हुआ अवसादी कटोरा अधिक ताज़े, कम ऑक्सीकरण हुए बेसाल्ट को उजागर करता है, जबकि बाहरी सतह रडार में चमकीली दिखने वाली खुरदरी ज्वालामुखीय सामग्री से बनी है—ऐसी चपटे-शीर्ष वाली संरचनाएँ अत्यंत श्यान, सिलिका-समृद्ध लावा के धीमे उफान और फिर उसके बैठ जाने से बनती मानी जाती हैं। चारों ओर जंग-रंगी बेसाल्टिक समतल, टूटे पत्थरों और प्राचीन प्रवाहों की पपड़ीदार बनावट के साथ दूर तक फैला है, पर हवा की घिसाई लगभग नदारद है, क्योंकि घना कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल होने पर भी सतह के पास हवाएँ सुस्त रहती हैं और रासायनिक अपक्षय यांत्रिक अपरदन पर भारी पड़ता है। ऊपर पीला-धूसर, निराकार आकाश सल्फ्यूरिक अम्लीय बादलों से छनकर आई बिखरी रोशनी फैलाता है, इसलिए कोई साफ़ छाया नहीं बनती—बस एक दमघोंटू, सर्वदिशी उजाला, जिसमें यह एक किलोमीटर ऊँचा गुंबद और भी अधिक परलोकिक, मौन और विराट प्रतीत होता है।
दूर-दूर तक फैला यह परिदृश्य गहरे धूसर बेसाल्टिक लावा-मैदानों का है, जिन पर लंबी, हल्की उठान वाली सलवट-जैसी रिजें सीधी रेखाओं की तरह क्षितिज की ओर बढ़ती दिखती हैं। ये “रिंकल रिज” वास्तव में पपड़ी पर संपीड़न के निशान हैं—लगभग 10 किलोमीटर चौड़ी और करीब 100 मीटर ऊँची लहरदार संरचनाएँ—जो जमे हुए ज्वालामुखीय मैदानों को धीरे-धीरे मोड़ती और उठाती हैं, जबकि लौह ऑक्साइड और हेमाटाइट की पतली परतें काली चट्टानों पर जंग-भूरे रंग की आभा बिखेरती हैं। ऊपर घना पीला-नारंगी धुंधलका, सल्फ्यूरिक अम्लीय बादलों और एरोसोल से भरा वायुमंडल, दृश्यता को लगभग तीन किलोमीटर तक सीमित कर देता है; इसलिए दूर की रिजें धुंध में घुलती जाती हैं और पास की दरारें, परतें तथा टूटे हुए शैलखंड तीखी रोशनी में उभर आते हैं। लगभग 475 डिग्री सेल्सियस तापमान और पृथ्वी की तुलना में लगभग 92 गुना अधिक सतही दाब के बीच खड़े होकर यह भूमि एक साथ स्थिर और हिंसक लगती है—मानो किसी जमे हुए ज्वालामुखीय महासागर पर हों, जहाँ समय, ऊष्मा और दबाव ने चट्टानों को ही परिदृश्य की भाषा बना दिया हो।
आपके सामने धरती की पपड़ी के खिंचकर फट जाने से बना एक विशाल रिफ्ट-ग्राबेन फैला है—दोनों ओर 600 से 900 मीटर ऊँची, लगभग सीधी भ्रंश-ढालें गहरे धँसे तल को घेरे हुए हैं, मानो पूरी भूमि बीच से नीचे बैठ गई हो। इन काली-धूसर चट्टानी दीवारों पर दिखती स्पष्ट परतें बताती हैं कि यहाँ बार-बार लावा बहा, ठंडा हुआ और फिर विवर्तनिक तनावों ने पपड़ी को तोड़कर अलग-अलग खंडों में बाँट दिया; तल पर चिकने बेसाल्टी मैदानों के बीच खुरदरे, रासायनिक अपक्षय से बदले भाग लौह-ऑक्साइड और सल्फेट खनिजों के लाल-भूरे, फीके क्रीम और मटमैले रंग बिखेरते हैं। ऊपर पीला-धूसर, धुंध से भरा आकाश मोटे वायुमंडल के कारण प्रकाश को इतना समान रूप से फैला देता है कि छायाएँ लगभग घुल जाती हैं, जबकि दूर का भूभाग कुछ ही किलोमीटर में धुंधला होकर गायब हो जाता है। लगभग 460°C तापमान और पृथ्वी की तुलना में लगभग 92 गुना अधिक दाब के इस दमघोंटू परिवेश में खड़े होकर यह दृश्य किसी जीवित ग्रह की नहीं, बल्कि भूगर्भीय हिंसा के ठहरे हुए क्षण की अनुभूति कराता है।
आपके सामने एक विशाल टिक-डोम ज्वालामुखी फैला है—चपटी, हल्की अवतल चोटी वाला यह उभरा हुआ पर्वत अपने केंद्रीय उच्च भाग से बाहर की ओर निकलती लंबी, धारदार कटक-रेखाओं के कारण किसी महाकाय मकड़ी के पैरों जैसा दिखता है। फीके से गहरे धूसर बेसाल्टिक शैल, घने कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल और सल्फ्यूरिक अम्लीय बादलों से छनकर आती पीली, सर्वदिशी रोशनी में मटमैले ताम्र-धूसर रंग ले लेते हैं, जबकि लगभग 465°C तापमान और लगभग 93 बार दाब ने इस भूभाग को नीचा, चौड़ा और अस्वाभाविक रूप से स्थिर आकार दिया है। कटकों के बीच की घाटियाँ, ढहाव से बने खंडित किनारे, और प्राचीन, सघन लावा के बहाव से बनी परतदार व टूटी सतहें संकेत देती हैं कि यहाँ का ज्वालामुखीय पदार्थ पृथ्वी की तुलना में अधिक श्यान रहा होगा, जो अत्यधिक दाब के नीचे धीरे-धीरे फैलकर जम गया। दूर तक देखने की कोशिश करते ही दृष्टि 100–200 मीटर के भीतर घनी पीली धुंध में घुल जाती है—क्षितिज, सूर्य और दूरस्थ स्थलरूप सब गायब—और लगभग 14,000 लक्स की छायारहित उजास में यह परिदृश्य ऐसा लगता है मानो आप किसी भट्ठी-जैसी, मौन और अंतहीन भूवैज्ञानिक दुनिया के तल पर खड़े हों।
आप एक ऊँचे, टूटी-बिखरी बेसाल्टी पठार पर खड़े हैं, जहाँ दाब और तापमान निचले मैदानों की तुलना में कुछ कम होकर भी लगभग 45 बार और 380°C के आसपास बने रहते हैं, और चट्टानों की सतह संपीडन से बनी लम्बी कटक-रेखाओं, सँकरी घाटियों और नुकीले शैलखण्डों से भरी दिखाई देती है। ऊँचाई पर फैली उजली, लगभग रजत-सी चमक दरअसल उन खनिज जमावों की है—विशेषकर सीसा सल्फाइड और बिस्मथ सल्फाइड—जो अपेक्षाकृत ठंडी परिस्थितियों में वायुमंडल से संघनित होकर ऊपरी धरातल को रडार पर असामान्य रूप से अधिक परावर्तक बनाते हैं। ऊपर का आकाश फीका धूसर-पीत है; घने कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल की परत यहाँ कुछ पतली होने से रोशनी थोड़ी अधिक साफ लगती है, फिर भी दूर की पर्वत-श्रृंखलाएँ कुछ ही किलोमीटर बाद धुंधले नारंगी-धूसर आवरण में खो जाती हैं। इस निर्जन, जलरहित, जीवन-विहीन विस्तार में हर दिशा में केवल विवर्तनिक दबाव, सल्फर-प्रधान रसायनिकी और खनिज वर्षण की कहानी लिखी है, मानो आप किसी शांत परंतु दहकते भूवैज्ञानिक नरक की चोटी पर खड़े हों।
आपके सामने गहरे धूसर से कोयला-रंग तक फैले बेसाल्टिक लावा के विस्तृत मैदान हैं, जहाँ एक के ऊपर एक चढ़ी अनेक प्राचीन प्रवाह-परतें सतह को सिलवटदार, रज्जुनुमा और जगह-जगह तीखे, खंडित किनारों वाली बनाती हैं। उभरी हुई मेड़ों के बीच मुड़ती-सर्पिल नालियाँ और 20 से 40 मीटर ऊँचे प्रवाह-किनारे दिखाते हैं कि यहाँ अलग-अलग ज्वालामुखीय विस्फोटों ने समय-समय पर नई लावा-चादरें बिछाईं, जिनकी सीमाएँ आज सूक्ष्म कगारों और लोबदार बनावट के रूप में पढ़ी जा सकती हैं। पीली-धूसर, सर्वदिशी रोशनी छायाएँ लगभग मिटा देती है, इसलिए दूरियाँ और ऊँचाइयाँ धोखा देती हैं, जबकि घना, अपारदर्शी वायुमंडलीय धुंधलका कुछ किलोमीटर बाद ही हर क्षितिज-चिह्न को निगल लेता है। लगभग 460°C की झुलसाती गर्मी, सल्फ्यूरिक रसायनों से बदली हुई महीन सतही परत, और कुछ गहरे लावा खंडों पर झलकती मंद लाल-सी तापदीप्ति इस बंजर दृश्य को एक साथ भूवैज्ञानिक रूप से परिचित और गहराई से परग्रही बना देती है—मानो आप ठोस हुई अग्नि के समुद्र पर खड़े हों।
यहाँ ऊँचे पठारी भूभाग पर फैली चाँदी-सी धूसर, परतदार सतह ऐसी दिखती है मानो तपते नरक पर धात्विक पाला जम गया हो—एक पतली, चमकीली खनिज परत जो ठंडे उच्च स्थलों पर वायुमंडलीय रासायनिक अंतःक्रियाओं से संघनित हुई मानी जाती है। सामने की महीन, कुरकुरी परतें और हल्की स्फटिकी चमक अचानक एक तीखी ऊँचाई-रेखा पर टूटती हैं, जहाँ से नीचे गहरे, अधिक गर्म, ऑक्सीकृत बेसाल्टी शैल शुरू हो जाते हैं; यह स्पष्ट सीमा बताती है कि ऊँचाई, तापमान और खनिज स्थिरता मिलकर सतह की रचना कैसे बदलते हैं। ऊपर घना कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल और सल्फ्यूरिक अम्लीय धुंध सूर्य के प्रकाश को पीले-धूसर कुहासे में बदल देती है, इसलिए छायाएँ कठोर नहीं बल्कि मुलायम और बिखरी हुई लगती हैं, जबकि दूरस्थ शिखर धुंध में घुलते जाते हैं। लगभग 700 केल्विन के आसपास की चरम परिस्थितियों, भारी दाब और रासायनिक अपक्षय के बीच यह दृश्य एक साथ सुंदर और भयावह प्रतीत होता है—मानो आप किसी ऐसी दुनिया की दहलीज पर खड़े हों जहाँ भूविज्ञान स्वयं धातु की चमक में साँस ले रहा हो।
आपके सामने लगभग 40 से 60 मीटर ऊँची एक क्षरित भ्रंश-कगार उठी है, जिसकी ढलान पर हल्की धूसर परतदार ज्वालामुखीय निक्षेप और गहरे चारकोल-धूसर बेसाल्टिक स्तर बारी-बारी से खुलते हुए सीढ़ीनुमा बनावट रचते हैं; कहीं कठोर उजली परतें बाहर निकली हुई हैं, तो कहीं अधिक घिसे अँधेरे स्तर पीछे हटकर छायादार खाँचें बना रहे हैं। कगार के पाद में टूटी चट्टानों का तलछटी ढेर फैलता है और उससे आगे प्राचीन, मंद उभरी हुई लावा-मैदानियाँ दूर तक पसरी हैं, जिनकी सतह पर छोटे-छोटे शिलाखंड, अपक्षय-जनित महीन पदार्थ और विरल हल्के रंग के जमाव बिखरे पड़े हैं। यह खुली स्तरिकीकरण एक भूवैज्ञानिक अभिलेख की तरह काम करती है—बार-बार हुए ज्वालामुखीय प्रवाह, बाद की टेक्टोनिक दरारों और अत्यधिक ताप, दाब तथा रासायनिक अपक्षय के संयुक्त प्रभावों को दर्ज करती हुई। ऊपर से छनकर आती गाढ़ी पीताभ-धूसर रोशनी, कार्बन डाइऑक्साइड से भरे घने वायुमंडल और सल्फ्यूरिक अम्ल एरोसोल की धुंध के कारण लगभग बिना तीखी छाया के सब कुछ नरम कर देती है, और तीन किलोमीटर से पहले ही क्षितिज को निगल लेने वाली यह धुंध इस दृश्य को विशाल, दमघोंटू और गहराई से परालौकिक बना देती है।
आपके सामने गहरे धूसर बेसाल्टी मैदानों का एक असीम विस्तार फैला है, जिन पर दरारों, भ्रंशों और धँसे हुए खंडों का इतना घना जाल उकेरा गया है कि पूरी सतह बहुभुजीय टुकड़ों में टूटी हुई दिखाई देती है। कुछ प्रमुख भ्रंश सैकड़ों मीटर गहरे कटाव खोलते हैं, जहाँ ठंडी हो चुकी लावा-परतों की स्तरित दीवारें दिखाई देती हैं, जबकि उनके बीच महीन सतही दरारें प्राचीन लावा प्रवाह के ठंडा होने, सिकुड़ने और बाद के टेक्टोनिक तनावों का रिकॉर्ड सँजोए हुए हैं। पीताभ-धूसर, सर्वदिश प्रकाश और पूरी तरह अपारदर्शी वायुमंडल गहराइयों से छायाएँ लगभग मिटा देते हैं, जिससे यह भू-दृश्य और भी अधिक सपाट, दबावपूर्ण और विचित्र लगता है, मानो क्षितिज स्वयं धुंध में घुल रहा हो। यहाँ की चट्टानें मुख्यतः ज्वालामुखीय बेसाल्ट हैं, जिन पर रासायनिक अपक्षय से लालिमा लिए ऑक्सीकरण के चिह्न उभरे हैं; इस टूटे-फूटे विस्तार को देखते हुए ऐसा महसूस होता है जैसे आप किसी जीवित, धीमे-धीमे विकृत होती पपड़ी पर खड़े हों, जहाँ ग्रह की भीतरी ऊष्मा और बाहरी दमनकारी परिस्थितियाँ मिलकर सतह को लगातार गढ़ती रहती हैं।
आपके सामने दूर-दूर तक फैला एक लगभग समतल ज्वालामुखीय मैदान है, जहाँ ठंडी पड़ चुकी बेसाल्टिक लावा-परतें टूटी हुई, कोणीय शिलाखंडों और बहुभुजी दरारों में बँटकर किसी फटी हुई सिरेमिक सतह जैसी दिखती हैं। इस घने, कार्बन डाइऑक्साइड-प्रधान वायुमंडल और गंधक-अम्लीय बादलों से छनकर आती बिखरी हुई रोशनी पूरे दृश्य को पीले-नारंगी, लगभग छायाहीन आभा में डुबो देती है, जबकि लगभग 90 पृथ्वी-वायुमंडल के दाब और भीषण तापमान का बोझ मानो हवा को ही भारी बना देता है। क्षितिज पर, दो से तीन किलोमीटर दूर, धुंध के पार एक अकेली पर्वत-चोटी गहरे धूसर साए की तरह उभरती है—विवरणहीन, पर विशाल—जो संकेत देती है कि ये शांत दिखने वाले मैदान वास्तव में प्राचीन ज्वालामुखीय प्रवाहों और सिकुड़ती लावा-सतहों से बने हैं। इस एकरंगी, धुंधले विस्तार में खड़े होकर ऐसा लगता है मानो समय, रंग और ध्वनि सब किसी घने, दमनकारी आकाश के नीचे दब गए हों।
आप एक लगभग तीन किलोमीटर चौड़े, अपेक्षाकृत ताज़ा प्रहार-गर्त के किनारे खड़े हैं, जहाँ सामने की दीवारें चौड़ी-चौड़ी सीढ़ीनुमा परतों में नीचे उतरती हुई गहरे चारकोल-धूसर, स्लेटी और भूरा-धूसर बेसाल्ट तथा आघात-पिघलित शैलों की तहें उजागर करती हैं। गर्त की मेड़ के चारों ओर नुकीले उछाले गए शैल-खण्ड, टूटी चट्टानें, कणदार रेगोलिथ और महीन खनिज-धूल बिखरी है, जबकि तल पर ब्रेशिया, दरकी हुई पट्टिकाएँ और गहरे काँचीय पिघलाव की सूक्ष्म जीभें उस हिंसक टक्कर की ऊर्जा का प्रमाण देती हैं। ऊपर आकाश नहीं, बल्कि पीताभ-धूसर, एकसमान चमकती धुंध की छत है—घने कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल और ऊँचे सल्फ्यूरिक अम्लीय बादलों से छनकर आती इतनी विसरित रोशनी कि न सूर्य का चिह्न दिखता है, न कोई साफ छाया बनती है। दूर की कगार लगभग तीन किलोमीटर पर ही रासायनिक कुहासे में धुँधली पड़ जाती है, और इस दबे, मद्धिम, दिशाहीन प्रकाश में निर्जल, निर्जीव ज्वालामुखीय मैदान एक विशाल, दमघोंटू और पूरी तरह परग्रही संसार का अहसास कराते हैं।
आपके सामने काली-धूसर बेसाल्टिक लावा-समतल से उठते कई चौड़े, एक-दूसरे से सटे शील्ड ज्वालामुखी फैलते हैं, जिनकी ढलानें इतनी मृदु हैं कि वे अलग-अलग शिखरों से अधिक एक विशाल संयुक्त ज्वालामुखीय पुंज जैसे लगते हैं; उनके शीर्ष पर धँसी हुई काल्डेरा और ढहे हुए किनारे पीली-धूसर धुंध के पार भी पहचाने जा सकते हैं। पैरों के पास टूटी हुई बेसाल्ट की पट्टियाँ, कोणीय ज्वालामुखीय शैल-खण्ड, और रस्सीनुमा तथा मलबेदार लावा-पर्पटी की बनावट इस बात का संकेत देती है कि यहाँ बार-बार बहने वाले मैफिक लावा ने विस्तृत मैदान बिछाए, जिन्हें बाद में अत्यधिक ताप और लगभग 92 बार दाब वाली घनी कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडलीय परिस्थितियों ने बदल डाला। दूर तक फैली सतह पर पुराने लावा-प्रवाह मोर्चे, हल्की सिकुड़ी-सी रिजें, उथली धाराएँ और नीची विवर्तनिक धारें मुश्किल से उभरती हैं, मानो पूरा परिदृश्य धीमी लेकिन ग्रह-स्तरीय ज्वालामुखीय पुनर्रचना का जमे हुए क्षणचित्र हो। ऊपर आकाश नहीं, बल्कि सल्फरी पीताभ-ओखर कुहासे की एक बिना-लक्षण छत है, जो सूर्यप्रकाश को इतना बिखेर देती है कि छायाएँ लगभग मिट जाती हैं—और इसी मंद, दमघोंटू उजाले में यह दृश्य असाधारण रूप से विशाल, निस्तब्ध और दमनकारी महसूस होता है।
आपके सामने चट्टानों का एक उलझा हुआ, बहुभुजी भूलभुलैया-सा प्रदेश फैला है, जहाँ प्राचीन टेसेरा भूभाग की नीची किन्तु खड़ी धारियाँ और संकरी खाइयाँ एक-दूसरे को काटती हुई एक अव्यवस्थित जाल रचती हैं। गहरे धूसर से कोयले-रंग की शिलाएँ टूटी, मुड़ी, धँसी और भ्रंशित दिखाई देती हैं; उनकी असामान्य रूप से रडार-उज्ज्वल, खुरदरी सतहें संकेत देती हैं कि यहाँ की चट्टानों में परावर्तक खनिज या अत्यधिक विकृत शैल-पर्पटी मौजूद हो सकती है, जिसे कभी शक्तिशाली विवर्तनिक बलों ने मरोड़ दिया होगा। दरारों में जमी गेरुए-भूरे धूलकणों के ऊपर पीली-एम्बर सल्फरी धुंध हर रोशनी को छान देती है, जिससे आकाश फीका, धूसर-बेज और लगभग निराकार लगता है, जबकि सूर्य केवल कहीं हल्की उजास के रूप में अनुमानित होता है। दूर जाते हुए यह कटक-जाल घने, दमनकारी वायुमंडल में धीरे-धीरे धुँधला पड़ जाता है, और पूरा दृश्य भट्ठी-जैसी गर्मी, अपार दाब और निष्ठुर शुष्कता का ऐसा अनुभव कराता है मानो आप किसी जीवित ग्रह की नहीं, बल्कि पत्थर में जमी हुई भूवैज्ञानिक उथल-पुथल की सतह पर खड़े हों।